अच्छे और सच्चे इंसानो के साथ बुरा क्यों होता है

 

महात्मा द्वारका जी सुबह उठकर गंगा स्नान करने के लिए जा रहे थे अंधेरे में उनकी ठोकर किसी ऐसी चीज से लगी जिसके मुंह से आवाज निकली है राम आप ही मेरे रक्षक हो राम का नाम सुनकर महात्मा जी रुके और पश्चाताप के लिए उन्होंने रास्ते में पड़े युवक को अपनी दोनों बाहों में भर कर उठाया है दुखी प्राणी आप इस प्रकार मार्ग में क्यों पड़े हो इस घने जंगल और पहाड़ों में इस प्रकार से पड़े रहकर रोना कुछ आश्चर्य से लगता है प्रभु की माया है स्वामी जी शुक्र है भगवान का कि आपने मेरे दुख को पूछा तो सही वरना इस स्वार्थी संसार में लोग दुखी आदमी का मजाक उड़ाते हैं कोई भी उसका दुख सुनने के लिए तैयार नहीं बेटा धर्म दया प्रेम इस संसार से कभी नहीं मिटते कुछ मिटता है तो घमंड तुलसी जी ने कहा भी है कि


दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान तुलसी दयाना छोड़िए जब तक घट में प्राण


बेटे अब तो मैं गंगा स्नान करने जा रहा हूं मेरी पूजा में देर हो रही है आप सामने मेरे आश्रम में आ जाना मैं आपके कष्ट दूर करने का प्रयास करूंगा तुम्हें निराश नहीं होना चाहिए जीवन के दुखों से भागना इंसान की सबसे बड़ी मूर्खता है साहस से काम लेने वाले लोग ही सफल होते हैं हर सच्चा ईश्वर भक्त कष्ट तो होता ही है परंतु आत्मिक शांति भी उसे ही मिलती है



इतनी बात कहकर महात्मा जी चले गए लेकिन उनका एक एक शब्द उसके मन में लिख गया उनके इन शब्दों ने उसके विचार बदल दिए वह तो आत्महत्या करने के लिए निकला था वह इस जीवन से तंग आ गया था इस संसार में सत्यवादी को कौन पूछता है महात्मा जी कहते हैं कि विजय तो सदा सत्य की ही होती है सत्य साहस विजय के प्रतीक है फिर मैं क्यों निराशावादी होकर इस जंगल में पड़ा हूं मुझे भी साहस से काम लेना चाहिए मौत तो कभी भी मिल सकती है लेकिन यह जीवन कभी नहीं मिलेगा जब तक सांस तब तक आज राजा चंद्रपाल अर्थात उसके पिता ने केवल उसकी बुद्धि परीक्षा लेने के लिए ही तो प्रश्न पूछे हैं बस इसी बात से क्रोधित होकर वह मरने चल दिया आज इस महात्मा ने आकर उसकी आंखें खोल दी है उसने मन में ठान लिया है कि अब मैं मरूंगा नहीं बल्कि संघर्ष करूंगा तेरे को के सारे में पिता के इन प्रश्नों का उत्तर देकर राजगद्दी पर बैठूंगा यही मेरी परीक्षा है यह सोचकर वह महात्मा जी के दर्शन करने तथा आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके आश्रम में गया आ गए बेटे हां स्वामी जी  आपने जीने की राह तो दिखा दी लेकिन उस राह पर चलने की शिक्षा नहीं दी बस उसे प्राप्त करने के लिए आपकी शरण में आया हूं हुकुम करो स्वामी जी मेरे पिता राजा चंद्रपाल ने मेरे सामने तीन शर्ते रखी है यदि मैं इन तीनों शर्तों को पूरा करूंगा तभी वह मुझ को राजगद्दी पर बैठने का अधिकार देंगे तो क्या हुआ इसमें कौन सी बुरी बात है दिल छोटा क्यों करते हो अपने आप पर विश्वास रखो ईश्वर पर भरोसा रखो इस संसार में सफलता उसे ही मिलती है भरोसा हो वह इंसान  तीन प्रसन्न तो क्या 300 प्रश्नों का उत्तर दे सकता है क्या तुम मुझे बता सकते हो कि उसने कौन से तीन प्रश्नों का उत्तर पूछा है

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ