राक्षस का हुआ अंत और राख से निकला मानव मैं विचारा उन सबको चाय कॉफी पीते देखकर ठंडी आहें भरते हुए कहने लगा मुझे दुख है कि मैंने वह काम नहीं किया जो आज की रात मेरे का माथा देखते-देखते सबके आगे बढ़ा स्वादिष्ट भोजन आ गया उसकी थाली में कंकड़ पत्थर रखे थे प्रताप एक कोने में छुपकर यह सारा नजारा देख रहा था न जाने कैसे उन लोगों की नजर प्रताप पर पड़ गई तभी उनमें से एक ने एक खाने की सजी थाली प्रताप के आगे भी रख दी तब प्रताप ने उस आदमी से पूछा भैया उस बेचारी का क्या दोष है जो आप उसे पत्थर और कंकड़ खाने को दे रहे हैं, इस प्रश्न का उत्तर यदि आप स्वयं ही जाकर उस आदमी से पूछेंगे तो अधिक उचित रहेगा ठीक है अब मैं स्वयं ही उससे बात करता हूं यह कहकर प्रताप सीधा उस आदमी के पास पहुंच गया उसे नमस्कार कहकर वह उसके पास ही बैठकर पूछने लगा कि आपके साथ ऐसा व्यवहार क्यों हो रहा है
उस बेचारे के मुंह से तो कुछ नया निकला परंतु उसकी आवाज आंखों से बहते आंसू उसकी दर्द भरी कहानी सुनाने के लिए व्याकुल हो रहे थे थोड़ी देर के बाद उसने अपने आंसुओं पर काबू पाते हुए कहना शुरू किया तुम पहले आदमी हो जिसे मेरी इस हालत को देखकर दया आई है वरना मेरे साथ तो कोई भी हमदर्दी करने को तैयार नहीं बस बस आप रोना बंद कर दे आंसू बहाने से कुछ नहीं मिलता इससे तो केवल अपने मन की आप को शांत कर सकते हैं मैं तो केवल आपकी इस हालत के बारे में जानना चाहता हूं कि इसका कारण क्या है देखो भाई मेरा नाम धनीराम है मैं बड़े गरीब घर में पैदा हुआ था परंतु धन कमाने के रास्ते मुझे पता चल गए मैंने हर उल्टे सीधे मार्ग से खूब धन कमाया नाम धनीराम था तो काम से भी धनी हो गया धन मैंने तो तिजोरी में बंद करके रखा है तो कहीं दान दिया और नहीं किसी के भले के लिए उसका उपयोग किया धन धन धन सुबह शाम रात धन धन धन कमाना और धन इकट्ठा करने में ही लगा रहा यहां तक कि जिस मंदिर में हर दिन सुबह के समय पूजा करने जाता था उस मंदिर को भी भूल कर घर पर ही मंदिर बनवा लिया सच बात तो यह थी कि धन अधिक होने के कारण मैं अपने माता-पिता बहन भाइयों मित्रों तक को भूल गया मैं और मेरा धन मेरी पत्नी मेरे बच्चे इन सब के सिवा मुझे कुछ याद नहीं रहा यह मेरा सब कुछ बन गया था 1 दिन मेरा यह अभिमान टूट गया जब डाकू ने आकर मेरा सब कुछ लूट लिया उसी गम में भूल भूल कर मेरी मृत्यु हो गई मरने के बाद तो मेरा कोई साथी नहीं रहा था सब कुछ छूट गया धन बीवी बच्चे सब के सब छूट गए आज मेरी औलाद धक्के खा रही है क्योंकि धन के नशे में अंधे होकर अपने घमंड में रहते हुए औलाद ने कभी कोई काम करने की आदत ही नहीं डाली और नहीं कोई ऐसी शिक्षा प्राप्त की जो उनके काम करने का माध्यम बन जाती वह सब के सब आज भूखे मर रहे हैं उनमें इतनी योग्यता भी नहीं है कि किसी अच्छे आदमी से बात कर सके धन का घमंड सबको ले डूबा किसी ने ठीक ही कहा है कि लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है जो अंधा होता है मैं जो यह दंड पा रहा हूं यह मेरे अपने कर्मों का ही फल है उसमें किसी का कोई दोष नहीं अब क्या आप ऐसे ही दुख सहन करते रहोगे प्रताप ने उससे पूछा देखो भैया मेरा कुछ दिन मेरे घर में धरती के नीचे दबा पड़ा है यदि आप मुझे इन सब दुखों से मुक्ति दिलवाना चाहते हो तो मेरे घर में जाकर इस धन को निकालकर आधा तो गरीबों में बांट दो आधा मेरी दुखी संतान को दे दो बस इससे मेरी मुक्ति हो जाएगी ।
ठीक है आप मुझे अपने घर का पता दे दो मैं जाकर उस दिन को निकाल लेता हूं और जैसा आप कहते हैं वैसा ही करूंगा आप चिंता ना करें भगवान ने चाहा तो मैं यह सब काम जल्द से जल्द कर कर आपको इन सब कष्टों से मुक्ति दिलवा दूंगा साथ ही आपकी संतान के भी दुखों को भी दूर कर दूंगा यह सब बातें उसे कह कर मैं जाने के लिए उठा तो मुझे धनीराम की हालत देखकर बहुत ही दुख हुआ और सोचने लगा कि इंसान का जीवन क्या है कुछ भी तो नहीं वह अपने साथ लाता क्या है और क्या ले जाता है धन कमाते कमाते वह पागल हो जाता है उस इंसान से बड़ा पागल कौन हो सकता है जो सारी उम्र धन कमाता है अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलता है दुनिया भर से धोखा करता है पाप करता है और अंत समय खाली हाथ जाता है यही नहीं मरने के बाद उसे भगवान के घर में अपने पापों का जो दंड मिलता है उसे बांटने वाला कोई नहीं संसार के सब अमीर लोगों को कंकर पत्थर ही खाने को मिलते हैं यही सोचते हुए प्रताप सिंह वहां से चल दिया ।

0 टिप्पणियाँ