राक्षस का हुआ अंत और राख से निकला मानव

 उन आवाजों को सुनते ही पूरे गांव वासी बुरी तरह डर गए थे मुखिया बेचारे की तो हालत खराब थी वह बार-बार अपने बेटे की ओर देख रहा था उधर प्रताप सिंह समझ गया था कि भूत आ चुका है अब वह मुखिया के लड़के की तलाश में होगा प्रताप ने शीशे के पीछे बैठे बैठे ही उसका ऊपर का कपड़ा हटा दिया भूत ने अपनी तस्वीर सामने लगे शीशे में देखें तो वह समझा शायद एक और वह उसे मारने के लिए आ गया है क्रोध के मारे वह और भी अधिक भयंकर आवाज निकालने लगा फिर काली आंधी आई काले बादल चारों ओर से गिर गिर कर आ गए प्रताप ने सूखी लकड़ियों में आग चारों ओर लगाकर उसमें गूगल के धनी और लहसुन को जला दिया जिन का प्रबंध उसने पहले से ही कर रखा था काला भूत अपनी ही छाया से लड़ रहा था उसे इस बात का जरा सा भी पता नहीं चल सका कि उस आंख के चारों ओर प्रताप ने लोहे से लकीर खींच कर उस पर लोहे के खूंटे गाड़ दिए हैं । 



फिर गायत्री मंत्र का पाठ करने लगा वह भूत भागने की तैयारी करने लगा लेकिन भागता कैसे प्रताप ने तो आग जलाकर लोहे के गुंडों से पहले से ही बांध रखा था उसके भागने का रास्ता बंद हो चुका था अब जाए तो कहां जाए आग बराबर उसकी और निरंतर बढ़ रही थी देखते ही देखते गया भूत आग में जल गया गांव वालों ने उसकी अंतिम चीख सुनी अब उन चीजों में डर नहीं था बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे कोई दया की भीख मांग रहा हो काले भूत का अंत हो गया था उस गांव के लोगों के मन में भूत के साथ-साथ मौत का डर भी खत्म हो गया था लेकिन एक बात जो सबसे अजीब थी कि अब मंगलवार की रात को फिर से ऐसी आवाजें आने लगी थी प्रताप सिंह को जब गांव के लोगों ने बताया कि भूत के मरने के बाद भी मंगलवार की रात को भयंकर आवाज सुनाई देती है तो प्रताप की समझ में यह बात नहीं आई उसने जब रात के समय उन आवाजों को सुना तो उसे पता चला कि यह एक भूत को नहीं बहुत से लोगों की आवाज है वह रात के समय उठकर उन आवाजों की तरफ चल दिए चलते-चलते वह श्मशान भूमि में जा पहुंचा उस समय वह इतना थक चुका था कि उसमें आगे चलने की हिम्मत ही नहीं थी उसने सोचा कि क्यों नहीं यहीं पर कुछ देर आराम कर लो यही सोचकर वह एक कोने में हरी हरी घास पर सो गया आदमी के मन में डर भरा हो तो उसे नींद कहां आती है कितनी ही देर तक वह करवटें बदलता रहा जैसा उसने देखा की आस पास की सारी अंजलि चिताओं की आग भड़क उठी है चिता की राख से एक बूढा निकला जिसके शरीर पर सफेद चादर थी एक बूढ़े ने घास पर सफेद चादर को विचार दिया उस पर सब के सब बूढ़े बैठ गए थोड़ी देर के बाद एक समाधि में से एक आदमी निकला उसके कपड़े भी बड़े पुराने थे शक्ल से बड़ा ही दुखी और उदास लगता था वह सबसे अलग-थलग होकर बैठ गया शेष सब लोग चाय कॉफी पीने लगे मगर उस बेचारे को किसी ने भी आकर ने कहा कि तुम भी चाय पी लो । 


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